Monday, August 13, 2012
Wednesday, March 21, 2012
इवेंट मैनेजमेंट : तेजी से उभरता कैरियर
हम आए दिन बड़े-बड़े आयोजनों की खबरें
पढ़ते रहते हैं। इस तरह के भव्य आयोजनों की व्यवस्था करना ही इवेंट मैनेजमेंट कहलाता
है। इन आयोजनों की सफलता के पीछे जिन लोगों की कड़ी मेहनत होती है, वे इवेंट मैनेजर
कहे जाते हैं।
इवेंट मैनेजर किसी भी आयोजन के आरंभ से
अंत तक होने वाले हर कार्यक्रम, हर पड़ाव का सुचारु संचालन करते हैं। इवेंट
मैनेजमेंट के अंतर्गत फैशन शो, संगीत समारोह, विवाह समारोह, थीम पार्टी, प्रदर्शनी,
कॉर्पोरेट सेमिनार, प्रोडक्ट लॉन्चिंग तथा फिल्मों के प्रीमियर आदि प्रोग्राम आते
हैं।
Monday, March 12, 2012
रंग खेलने में जल का क्या काम मन की तरंगें ही काफी हैं
भारत में
त्योहारों की रचना बड़े शानदार ढंग से की गई है। हमने रंगों को भी त्योहार से जोड़
दिया है। जिंदगी रंगीन होनी चाहिए, इस पंक्ति
का अर्थ है जीवन में सुख और शांति दोनों एक साथ हो। होली के बाद रंगपंचमी पर
जलविहीन रंग एक-दूसरे को लगाने का बड़ा आध्यात्मिक अर्थ है।
हम अपने
हाथों से किसी को रंग लगा रहे हों और कोई दूसरा जब हमें रंग लगा रहा हो, तब उस अबीर-गुलाल के ‘कलर’ पर मत टिक जाइए, क्योंकि
कलर केवल एक शरीर है। इस शरीर के भीतर की आत्मा को समझते हुए रंग लगाएं और लगवाएं।
इसे यूं समझ लें कि हमारे यहां भोजन की शुद्धि पर बड़ा जोर दिया गया है। इसीलिए
कहा जाता है हर किसी के हाथ का बना हुआ भोजन न करें। घर की माता-बहन जब भोजन बनाकर
खिलाती है तो उनके हाथों की संवेदना और प्रेम तरंगों के रूप में भोजन में उतरते
हैं। थोड़े भी संवेदनशील व्यक्ति इसका असर महसूस भी कर सकेंगे।
आप बाहर
अच्छे से अच्छे महंगे स्थान का भोजन कर लें, लेकिन
गहराई से महसूस करें तो पाएंगे कि इसमें कोई न कोई कमी है। यह भोजन कुछ इस तरह का
होता है, जैसे निष्प्राण देह को सोलह श्रंगार करा दिया गया
है। इसीलिए बाहर का भोजन केवल शरीर का भोजन बनकर रह जाता है, आत्मा अतृप्त ही रहती है। होली हो या रंगपंचमी, इस दिन रंगों को हाथ में लेते समय यही भाव रखिए कि
आपकी आत्मा से होती हुई तरंगें हथेलियों से गुजरकर रंग के कणों में उतर रही हैं और
प्रेम का सेतु एक-दूसरे के बीच बना रहे। फिर इसमें जल का क्या काम, मन की तरंगें ही काफी हैं।
Wednesday, March 7, 2012
धर्मग्रंथों से सदाचरण ग्रहण करने की शिक्षा दी महात्मा ने
एक महात्मा बड़े ज्ञानी थे। वे
प्राय: अपने शिष्यों को रामायण, महाभारत
और नीति ग्रंथों की अच्छी बातें बताकर उन्हें अपने आचरण में उतारने का आग्रह करते
थे। प्रतिदिन संध्या को वे प्रवचन करते और श्रोताओं को इन धर्मग्रंथों की कथाएं व
दृष्टांत सुनाकर उनमें सदाचरण जाग्रत करने का प्रयास करते थे। स्वयं महात्माजी का
आचरण भी तदनुकूल ही था।
वे कंदमूल खाते, कभी किसी वस्तु की इच्छा न करते थे और संग्रह में उनकी कदापि रुचि नहीं थी। यदि कोई शिष्य अथवा श्रोता श्रद्धापूर्वक उन्हें कुछ भेंट करता तो वे तत्क्षण उसे किसी जरूरतमंद को दान कर देते। प्रवचन के पश्चात लोगों के प्रश्नों व जिज्ञासाओं का भी महात्माजी समाधान करते।
वे प्राय: रामायण आदि ग्रंथों से शिक्षा ग्रहण करने की बात कहते थे। एक दिन किसी व्यक्ति ने उनसे प्रश्न किया - ‘महात्माजी! रामायण को सही माना जाए या गलत?’ उन्होंने उत्तर दिया - ‘वत्स! जब रामायण की रचना हुई थी, तब मैं नहीं था। रामजी वन में विचरण कर रहे थे, तब भी मेरा अता-पता नहीं था। इसलिए मैं बता नहीं सकता कि रामायण सही है या गलत। मैं तो सिर्फ इतना बता सकता हूं कि इसके अध्ययन एवं शिक्षा से मैं सुधरकर इस स्थिति में हूं। चाहो तो तुम भी इसका प्रयोग कर अपना जीवन बेहतर बना सकते हो।’
वे कंदमूल खाते, कभी किसी वस्तु की इच्छा न करते थे और संग्रह में उनकी कदापि रुचि नहीं थी। यदि कोई शिष्य अथवा श्रोता श्रद्धापूर्वक उन्हें कुछ भेंट करता तो वे तत्क्षण उसे किसी जरूरतमंद को दान कर देते। प्रवचन के पश्चात लोगों के प्रश्नों व जिज्ञासाओं का भी महात्माजी समाधान करते।
वे प्राय: रामायण आदि ग्रंथों से शिक्षा ग्रहण करने की बात कहते थे। एक दिन किसी व्यक्ति ने उनसे प्रश्न किया - ‘महात्माजी! रामायण को सही माना जाए या गलत?’ उन्होंने उत्तर दिया - ‘वत्स! जब रामायण की रचना हुई थी, तब मैं नहीं था। रामजी वन में विचरण कर रहे थे, तब भी मेरा अता-पता नहीं था। इसलिए मैं बता नहीं सकता कि रामायण सही है या गलत। मैं तो सिर्फ इतना बता सकता हूं कि इसके अध्ययन एवं शिक्षा से मैं सुधरकर इस स्थिति में हूं। चाहो तो तुम भी इसका प्रयोग कर अपना जीवन बेहतर बना सकते हो।’
सार यह है कि धर्मग्रंथ व
नीतिग्रंथ तर्क का विषय नहीं होते। उनमें सतोमुखी जीवन के तत्व होते हैं। अत: उनसे
अपने जीवन को सार्थकता देने की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, न कि उन्हें तर्क की कसौटी पर कसना चाहिए।
Sunday, March 4, 2012
वैष्णव धर्म / वैष्णव सम्प्रदाय / भागवत धर्म
वैष्णव धर्म या वैष्णव सम्प्रदाय का प्राचीन नाम
भागवत धर्म या पांचरात्र मत है। इस सम्प्रदाय के प्रधान उपास्य देव वासुदेव हैं, जिन्हें
छ: गुणों ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, ऐश्वर्य और तेज से सम्पन्न होने के कारण भगवान या 'भगवत' कहा गया है और भगवत के उपासक भागवत कहलाते हैं। इस सम्प्रदाय की
पांचरात्र संज्ञा के सम्बन्ध में अनेक मत व्यक्त किये गये हैं।
व्यस्तता से थोड़ा वक्त प्रार्थना के लिए निकाल कर तो देखिए
कार्यस्थल
और धर्मस्थल दोनों में ऊपरी तौर पर फर्क है। कार्यस्थल पर आप अपने हिस्से का कमाने
जाते हैं, धर्मस्थल पर परमात्मा के अधिकार का उसे देने जाते
हैं। कार्यस्थल हमें धन देता है और पूजास्थल धर्म देते हैं। कार्यस्थल पर ज्यादा
समय अशांति, कम समय शांति रहेगी तथा धर्मस्थल पर अधिक समय शांति, कम समय अशांति रहेगी। हम जब अपने ऑफिस, दुकान, संस्थान में कार्यरत रहते हैं, तो अपने काम को समय और लक्ष्य से साध कर चलते हैं। अच्छे-बुरे लोगों से सामना होता ही रहता है। अच्छे लोग तो खैर
कुछ देकर ही जाते हैं, लेकिन चालाक, छल-कपट वालों से भी सामना होगा। ऐसे समय हमें भी
सुरक्षा की तैयारी करना होगी। एक प्रयोग करते रहें। अपने प्रोफेशनल डिसीप्लिन और
कमिटमेंट को जरा परमात्मा की ओर भी मोड़िए। आपके कार्य की समयावधि जो भी हो, उसमें से कुछ समय प्रार्थना के लिए रिजर्व रखिए।
अपने
कार्यस्थल पर प्रार्थना के माध्यम से परमात्मा को याद करना हमारे प्रोफेशनल
नज़रियें को और बढा देगा | कामकाज में प्रार्थना ईश्वर से मीटिंग और
एपांइटमेंट दोनों हैं। हम अपने भीतर के नकारात्मक व्यक्तित्व को स्वीकार नहीं कर
पाते हैं, यही व्यक्तित्व कार्यस्थल पर और सक्रिय रहता है।
थोड़ी सी देर हम प्रार्थना से जुड़ते हैं। हमारे भीतर जाग्रति, सतर्कता, विश्वास, जुनून, प्रतिबद्धता और आनंद बहने लगेगा।
इसके बाद हम जो भी बोलेंगे, वे
शब्द प्रभावशाली और दूसरों के लिए स्वीकार करने योग्य होंगे। 8-10 घंटे काम करते हुए हम कुछ समय चाय-नाश्ता, भोजन, चर्चा में जरूर बिताते हैं। इसी में से थोड़ा वक्त
प्रार्थना को दे दीजिए। प्रार्थना का रूप क्या रखेंगे, यह आप अपनी स्थिति पर निर्धारित कर लें, पर प्रार्थना करें जरूर। यहीं से आप प्रतिदिन विजय यात्रा
करेंगे। तारीफ पचाना, उद्देश्य छिपाना, योजनाएं
बनाना और प्रगति सही वक्त पर दिखाना, ये सब युद्ध के पहले ही विजय की घोषणा के लक्षण
हैं। काम के दौरान प्रार्थना से जुड़कर ये खूबियां स्वत: आएंगी।
Saturday, March 3, 2012
हमारे मूड का कंट्रोल दूसरों के हाथों में रहता है
सबसे बड़ी विजय है अपने स्वभाव का स्वामी बनना। इसका अर्थ है जीवन पर स्वयं का नियंत्रण। अभी हमारा जीवन दूसरों से संचालित है। दूसरों की टिप्पणियों और राय से हमारा दिनभर तय होता है। हमारे मूड का कंट्रोल दूसरों के हाथों में रहता है। इसका कारण है मन पर हमारा ज्यादा टिकना। मन को दूसरों में रुचि होती है। बुद्धि को व्यवस्थित रखना हो तो ज्ञान काम आता है। भक्ति से भावनाएं संभाली जाती हैं, लेकिन मन को नियंत्रित करना हो तो साधना करनी पड़ेगी। केवल साधना से भी काम नहीं चलेगा। दरअसल मन का सबसे अच्छा नियंत्रण ध्यान या मेडिटेशन द्वारा ही होगा। इंद्रियों और मन को प्रशिक्षित करने की क्रिया ध्यान है। हमारी आंतरिक बेचैनी का केंद्र मन ही होता है। भारतीय संस्कृति ने साधना के जितने रूप बताए हैं, उनमें एक है जागरण। यह भी एक तरह की साधना है, जिसमें श्रवण द्वारा मन को नियंत्रित किया जाता है। आजकल भक्ति की दुनिया में जागरण का बहुत जोर है। जागरण को केवल एक रतजगा न मानें। ये तो परमपिता और जगद्माता की गोद में समय बिताने जैसा है। जागरण एक तरह का उपवास है। इसका शाब्दिक अर्थ है परमात्मा के पास बैठना। उपवास में हम इंद्रियों पर अपने नियंत्रण के प्रयोग करते हैं। उपवास का साधारण अर्थ समझा जाता है कि अन्न का भोजन नहीं करना, यानी पेट भरने के मामले में नियंत्रण। लेकिन मामला केवल उस उदर का नहीं है, जहां भोजन भरा जाता है। सच तो यह है कि हर इंद्रिय का अपना पेट होता है, जो उसके विषय से भरता है। जागरण करें या उपवास, अभ्यास यह करें कि मन पर नियंत्रण सधे। यहीं से शांति व सुकून मिलेगा।
बाहरी रिश्तों के समान ही हमें स्वयं से भी रिश्ता बनाना चाहिए
संसार में रहते हुए हम अनेक लोगों से रिश्ते बनाते हैं। हर रिश्ता एक दायित्व होता है। दायित्व बोध आध्यात्मिक जागृति के लिए भी आवश्यक है। जिस तरह हम बाहरी रिश्ते बनाते हैं, हमें स्वयं से भी अपना रिश्ता बनाना चाहिए। इस बात पर बराबर नजर रखनी चाहिए कि हमारे स्वयं से रिश्ते कैसे हैं। क्या हम उसका निर्वहन ठीक से कर रहे हैं? दरअसल स्वयं से रिश्ता बनाने के लिए अपने भीतर उतरना पड़ता है। अध्यात्म कहता है - मनुष्य भविष्य में झांकने में रुचि रखता है। भविष्य में चुनौतियां हो सकती हैं, लेकिन अनुभव नहीं होता। अतीत में स्मृतियां होती हैं, इसलिए अपने अतीत से अनुभव प्राप्त करना चाहिए। अतीत का अनुभव हमें न सिर्फ पीछे ले जाता है, बल्कि अपने भीतर उतरने में भी मदद करता है। मनुष्य अपने भीतर जाकर ही जान सकता है कि यहां हमारा रिश्ता अपनी चेतना से हो जाता है। ध्यान रखें, भीतर उतरते समय अहंकार एक बाधा है, इसे जरूर दूर किया जाए। बाहरी रिश्ते निवेश के लिए होते हैं और भीतर का रिश्ता बोध के लिए बनता है। जैसे ही हम स्वयं से रिश्ता बनाते हैं, हमारे आसपास एक दैवीय शक्ति सुरक्षा के लिए सक्रिय हो जाती है। ध्यान हमारे लिए सरल होने लगता है। हमें बाहर की स्थितियों से विराम मिलने लगता है, हमारी आत्मा को उसकी खुराक प्राप्त हो जाती है। भीतर उतरते ही हमें अपने जीवन में कुछ परिवर्तन महसूस होंगे। कुछ लोग इन परिवर्तनों से घबरा जाते हैं, लेकिन ये परिवर्तन एक उपलब्धि है। यह हमारे विश्वास को बढ़ाएंगे। हमारे आसपास सौंदर्य, शांति और सुख की वृद्धि करेंगे। इसलिए इस रिश्ते को जीवन में जरूर पैदा करें।
जीवन में जब तनाव आए तो उसे चुनौती मानकर स्वीकार करें
कोई काम करते हुए दबाव बन जाना स्वाभाविक है, लेकिन तनाव में आ जाना ठीक नहीं। प्रेशर और टेंशन के बीच की लक्ष्मण रेखा को हमें समझना चाहिए। तनाव को सांसारिक दृष्टिकोण से देखेंगे तो हम पाएंगे कि हमारे आसपास नेगेटिव ऊर्जा एकत्र हो गई है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि हमें सकारात्मक संकेत देगी। यह दृष्टि हमें बताएगी कि तनाव हमारी क्षमता को बढ़ा देगा। दरअसल तनाव सकारात्मक घटना का नकारात्मक नाम है। जीवन में जब तनाव आए, तब इसे चुनौती मानकर स्वीकार करेंगे तो तनाव दबाव में बदलेगा और दबाव की कार्यशैली हमारी योग्यता को बढ़ा देगी। एक प्रयोग किया जा सकता है। जब तनाव आए तो अपनी इंद्रियों पर लौट जाइए। उदाहरण के तौर पर जैसे आंख हमारी एक इंद्रिय है। हम आंखें बंद करें और पूरी तरह से उसी पर एकाग्र हो जाएं। एक आध्यात्मिक व्यवस्था है कि सभी इंद्रियां भीतर से अपने परिणामों को लेकर इंटरकनेक्टेट हैं। जिस दिन हम आंख नाम की इंद्रिय पर नियंत्रण करेंगे, हम पाएंगे कान पर भी हमारा नियंत्रण शुरू हो गया। आंख से जो हम भीतर दर्शन कर रहे होंगे, कान से भी दिव्य श्रवण होने लगेगा। यह एक नया अनुभव रहेगा। यह भीतरी अनुभव हमें बाहरी तनाव से मुक्त करेगा। बाहर काम तो होना ही है, आप नहीं करेंगे तो कोई दूसरा करेगा, पर तनाव से परेशान होकर आप उस दौड़ में या तो बाहर हो जाएंगे या लडख़ड़ाकर गिर जाएंगे। अंतिम सफलता या तो असफलता में बदल जाएगी या अशांति में। अत: तनावमुक्त होने के लिए अपनी इंद्रियों पर लौटने का यह छोटा-सा प्रयोग करते रहें।
Monday, October 31, 2011
वैष्णव धर्म / वैष्णव सम्प्रदाय / भागवत धर्म
वैष्णव धर्म या वैष्णव सम्प्रदाय का प्राचीन नाम भागवत धर्म या पांचरात्र मत है। इस सम्प्रदाय के प्रधान उपास्य देव वासुदेव हैं, जिन्हें छ: गुणों ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, ऐश्वर्य और तेज से सम्पन्न होने के कारण भगवान या 'भगवत' कहा गया है और भगवत के उपासक भागवत कहलाते हैं। इस सम्प्रदाय की पांचरात्र संज्ञा के सम्बन्ध में अनेक मत व्यक्त किये गये हैं। 'महाभारत'[1] के अनुसार चार वेदों और सांख्ययोग के समावेश के कारण यह नारायणीय महापनिषद पांचरात्र कहलाता है। नारद पांचरात्र के अनुसार इसमें ब्रह्म, मुक्ति, भोग, योग और संसार–पाँच विषयों का 'रात्र' अर्थात ज्ञान होने के कारण यह पांचरात्र है। 'ईश्वरसंहिता', 'पाद्मतन्त', 'विष्णुसंहिता' और 'परमसंहिता' ने भी इसकी भिन्न-भिन्न प्रकार से व्याख्या की है। 'शतपथ ब्राह्मण'[2] के अनुसार सूत्र की पाँच रातों में इस धर्म की व्याख्या की गयी थी, इस कारण इसका नाम पांचरात्र पड़ा। इस धर्म के 'नारायणीय', ऐकान्तिक' और 'सात्वत' नाम भी प्रचलित रहे हैं।
Sunday, October 23, 2011
धनतेरस: इस यंत्र के पूजन से मिलेगी दुनिया की हर खुशी
कौन नहीं चाहता कि उसके पास अथाह धन-संपत्ति हो। उसे दुनिया के सारे ऐशो-आराम मिले। कभी किसी चीज की कमी न हो। अगर आप भी यही चाहते हैं तो इस चमत्कारी यंत्र के माध्यम से आपका यह सपना पूरा हो सकता है। यह चमत्कारी यंत्र है कुबेर यंत्र। स्वर्ण लाभ, रत्न लाभ, गड़े हुए धन का लाभ एवं पैतृक सम्पत्ति का लाभ चाहने वाले लोगों के लिए कुबेर यंत्र अत्यन्त सफलता दायक है। इस यंत्र के प्रभाव से अनेक मार्गों से धन आने लगता है एवं धन संचय भी होने लगता है। इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा होती है। धनतेरस(24 अक्टूबर, सोमवार) को इस यंत्र की स्थापना कर इसका पूजन करें।
यंत्र का उपयोग
विल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर इस यंत्र को सामने रखकर कुबेर मंत्र को शुद्धता पूर्वक जप करने से यंत्र सिद्ध होता है तथा यंत्र सिद्ध होने के पश्चात इसे गल्ले या तिजोरी में स्थापित किया जाता है। इसके स्थापना के पश्चात् दरिद्रता का नाश होकर, प्रचुर धन व यश की प्राप्ति होती है।
मंत्र
ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन्य धन्याधिपतये धन धान्य समृद्धि में देहित दापय स्वाहा
यंत्र का उपयोग
विल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर इस यंत्र को सामने रखकर कुबेर मंत्र को शुद्धता पूर्वक जप करने से यंत्र सिद्ध होता है तथा यंत्र सिद्ध होने के पश्चात इसे गल्ले या तिजोरी में स्थापित किया जाता है। इसके स्थापना के पश्चात् दरिद्रता का नाश होकर, प्रचुर धन व यश की प्राप्ति होती है।
मंत्र
ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन्य धन्याधिपतये धन धान्य समृद्धि में देहित दापय स्वाहा
इस प्रकार सजी थाली देखकर धन बरसाती हैं महालक्ष्मी
लक्ष्मी पूजन पूरे विधि-विधान से किया जाना अति आवश्यक है। तभी देवी लक्ष्मी की कृपा तुरंत ही प्राप्त होती है। पूजन के समय सबसे जरूरी है कि पूजा की थाली शास्त्रों के अनुसार सजाई जाए।
पूजा की थाली के संबंध में शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि लक्ष्मी पूजन में तीन थालियां सजानी चाहिए।
पहली थाली में 11 दीपक समान दूरी पर रखें कर सजाएं।
दूसरी थाली में पूजन सामग्री इस क्रम में सजाएं- सबसे पहले धानी (खील), बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चंदन का लेप, सिंदूर कुमकुम, सुपारी और थाली के बीच में पान रखें।
तीसरी थाली में इस क्रम में सामग्री सजाएं- सबसे पहले फूल, दूर्वा, चावल, लौंग, इलाइची, केसर-कपूर, हल्दी चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।
इस तरह थाली सजा कर लक्ष्मी पूजन करें।
पूजा की थाली के संबंध में शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि लक्ष्मी पूजन में तीन थालियां सजानी चाहिए।
पहली थाली में 11 दीपक समान दूरी पर रखें कर सजाएं।
दूसरी थाली में पूजन सामग्री इस क्रम में सजाएं- सबसे पहले धानी (खील), बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चंदन का लेप, सिंदूर कुमकुम, सुपारी और थाली के बीच में पान रखें।
तीसरी थाली में इस क्रम में सामग्री सजाएं- सबसे पहले फूल, दूर्वा, चावल, लौंग, इलाइची, केसर-कपूर, हल्दी चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।
इस तरह थाली सजा कर लक्ष्मी पूजन करें।
धनतेरस-सोम प्रदोष का दुर्लभ योग, मालामाल बना देगी इस मंत्र से शिव पूजा
जीवन में सुख, शांति और सौंदर्य की कामना है तो मन, वचन व कर्म में सत्य की मौजूदगी भी जरूरी है। शिव हो या शंकर हर स्वरूप व शब्द में भी शमन यानी सुख व शांति का भाव ही छुपा है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान शंकर ने समुद्र मंथन से निकले घातक विष को पीकर जगत के दु:खों का शमन किया और इसी मंथन से ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी प्रकट हुई।
सिर्फ एक दिन की सजावट बना देगी अमीर
आपको जान कर अजीब लगेगा कि एक ही दिन की सजावट आपको अमीर बना सकती है। लेकिन ये सच है कि अगर आप सिर्फ दिवाली के ही दिन वास्तु के अनुसार सजावट कर लें तो भी आप पर धनलक्ष्मी खुश हो जाएगी।
जानें कैसी सजावट बना देगी अमीर
- दीपावली के दिन सुबह घर के बाहर उत्तर दिशा में रंगोली बनानी चाहिए।
- वास्तु के अनुसार घर में पौछा लगाते समय नमक मिला कर पोंछा लगाएं।
- घर के परदें पिंक कलर के होने चाहिए।
- घर के डायनिंग हॉल में कांच के बाउल में पानी भर कर उसमें लाल फूल रखें।
- घर में दीपक लगाते समय इस बात का ध्यान रखें कि दीपक में थोड़े चावल और कुंकु डाल कर रखें।
- घर के जिस कमरे में तिजोरी हो उस कमरे में लाल फूल बिछा कर रखें।
- तिजोरी वाले कमरे में पीले और पिंक रंग के परदें रखना चाहिए।
- दीपावली के दिन सुबह-शाम गुग्गल की धूप दें।
- घर की सजावट में पीले फूलों का उपयोग करें।
जानें कैसी सजावट बना देगी अमीर
- दीपावली के दिन सुबह घर के बाहर उत्तर दिशा में रंगोली बनानी चाहिए।
- वास्तु के अनुसार घर में पौछा लगाते समय नमक मिला कर पोंछा लगाएं।
- घर के परदें पिंक कलर के होने चाहिए।
- घर के डायनिंग हॉल में कांच के बाउल में पानी भर कर उसमें लाल फूल रखें।
- घर में दीपक लगाते समय इस बात का ध्यान रखें कि दीपक में थोड़े चावल और कुंकु डाल कर रखें।
- घर के जिस कमरे में तिजोरी हो उस कमरे में लाल फूल बिछा कर रखें।
- तिजोरी वाले कमरे में पीले और पिंक रंग के परदें रखना चाहिए।
- दीपावली के दिन सुबह-शाम गुग्गल की धूप दें।
- घर की सजावट में पीले फूलों का उपयोग करें।
आपके घर में रहेगी लक्ष्मी, जब दीपावली पर करेंगे यह उपाय
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार दीपावली के दिन विधि-विधान से यदि लक्ष्मीजी की पूजा की जाए तो वे अति प्रसन्न होती हैं। इसके अलावा यदि दीपावली(26 अक्टूबर, बुधवार) के शुभ अवसर पर नीचे लिखे साधारण उपाय किए जाएं तो और भी श्रेष्ठ रहता है और घर में लक्ष्मी का स्थाई निवास हो जाता है। यह उपाय इस प्रकार हैं-
1- दीपावली के दिन पीपल को प्रणाम करके एक पत्ता तोड़ लाएं और इसे पूजा स्थान पर रखें। इसके बाद जब शनिवार आए तो वह पत्ता पुन: पीपल को अर्पित कर दें और दूसरा पत्ता ले आएं। यह प्रक्रिया हर शनिवार को करें। इससे घर में लक्ष्मी की स्थाई निवास रहेगा और शनिदेव की प्रसन्न होंगे।
2- दीपावली पर मां लक्ष्मी को घर में बनी खीर या सफेद मिठाई को भोग लगाएं तो शुभ फल प्राप्त होता है।
3- दीपावली की रात 21 लाल हकीक पत्थर अपने धन स्थान(तिजोरी, लॉकर, अलमारी) पर से ऊसारकर घर के मध्य(ब्रह्म स्थान) पर गाढ़ दें।
4- दीपावली के दिन घर के पश्चिम में खुले स्थान पर पितरों के नाम से चौदह दीपक लगाएं।
दीपावली: बहीखाता, कुबेर, तुला व दीपमाला पूजन विधि
दीपावली पर बहीखाता पूजन, कुबेर पूजन, तुला पूजन तथा दीपमाला का पूजन भी किया जाता है। इनकी पूजन विधि इस प्रकार है-
बहीखाता पूजन- बही, बसना तथा थैली में रोली या केसरयुक्त चंदन से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं एवं थैली में पांच हल्दी की गांठें, धनिया, कमलगट्टा, अक्षत, दूर्वा और द्रव्य रखकर उसमें सरस्वती का पूजन करें। सर्वप्रथम सरस्वती का ध्यान इस प्रकार करें-Wednesday, May 25, 2011
स्वामी रामानन्दाचार्य
स्वामी रामानंद़ को मध्यकालीन भक्ति आंदोलन का महान संत माना जाता है.उन्होंने रामभक्ति की धारा को समाज के निचले तबके तक पहुंचाया.वे पहले ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार किया.उनके बारे में प्रचलित कहावत है कि -द्वविड़ भक्ति उपजौ-लायो रामानंद.यानि उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार करने का श्रेय स्वामी रामानंद को जाता है.उन्होंने तत्कालीन समाज में ब्याप्त कुरीतियों जैसे छूयाछूत,ऊंच-नीच और जात-पात का विरोध किया .
Monday, May 23, 2011
भक्त धन्ना
धन्ना एक ग्रामीण किसान का सीधा-सादा लड़का था। गाँव में आये हुए किसी पण्डित से भागवत की कथा सुनी थी। पण्डित जब सप्ताह पूरी करके, गाँव से दक्षिणा, माल-सामग्री लेकर घोड़े पर रवाना हो रहे थे तब धन्ना जाट ने घोड़े पर बैठे हुए पण्डित जी के पैर पकड़ेः
"महाराज ! आपने कहा कि ठाकुरजी की पूजा करने वाले का बेड़ा पार हो जाता है। जो ठाकुरजी की सेवा-पूजा नहीं करता वह इन्सान नहीं हैवान है। गुरु महाराज ! आप तो जा रहे हैं। मुझे ठाकुरजी की पूजा की विधि बताते जाइये।"
Sunday, May 15, 2011
विवाह के आठ रूप
कर्तव्य और जिम्मेदारियों के पैमाने पर ही इंसान की सही परख और पहचान होती है। इन दायित्वों को समझ और आगे बढ़कर आत्मविश्वास व सक्षमता के साथ पूरा करने पर इंसान पद, सम्मान, भरोसा, सहयोग और प्रेम पाकर जीवन को सफल बना सकता है। व्यावहारिक जीवन में जिम्मेदारियों के निर्वहन का ही समय होता है - गृहस्थ जीवन। आम भाषा में इसे घर बसाना और चलाना भी कहते हैं।
Friday, May 13, 2011
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