टाइम मैगजीन में एक रिपोर्ट के अनुसार, मेडिकल सेंटर में हृदय रोगियों को ऑपरेशन से पहले एक मनोवैज्ञानिक प्रोग्राम से अवगत कराया जाता है, जिसमें अंगमर्दन,योग व ध्यान करने को कहा जाता है। अधिकतर रोगियों को सर्जरी से पहले ॐ का उच्चारण करने के लिए कहा जाता है। उनका तर्क था कि इससे वे तनावमुक्त हो जाते हैं और उनका मन शांत हो जाता है।
Tuesday, April 19, 2011
Monday, April 18, 2011
Sunday, April 17, 2011
आप और तिल
माथे पर--------- बलवान हो
ठुड्डी पर-------- स्त्री से प्रेम न रहे
दोनों बांहों के बीच-- यात्रा होती रहे
मौन
महान संत महर्षि रमण मौन रहते हुए भी अपने पास आने वालों की सूक्ष्म से सूक्ष्म शंकाओं का समाधान कर देते थे। महात्मा गांधी सप्ताह में एक दिन मौन रहा करते थे। मौन आंतरिक आनंद लुटाता है। यह हमारी आत्मा की आवाज है। इसकी साधना से हमें वे सभी सिद्धियां मिल जाती हैं, जो अन्य कठिन योग साधनाओं से भी प्राप्त नहीं हो पाती हैं।
वाणी चार प्रकार की होती है। नाभि में परावाणी, हृदय में पश्यंति,कंठ में मध्यमा वाणी और मुख में वैखरी वाणी निवास करती है। हम शब्दों की उत्पत्ति परावाणीमें करते हैं, लेकिन जब शब्द स्थूल रूप धारण करता है, तब मुख में स्थित वैखरी वाणी द्वारा बाहर निकलता है। इनमें परा और पश्यंतिसूक्ष्म तथा मध्यमा व वैखरी स्थूल है। अनावश्यक वाणी को अपने मुंह से नहीं निकालना और आवश्यक कथन में भी वाणी का संयम हमारे लिए बहुत बडी साधना है। हमारे योग साहित्य में दो प्रकार के मौन का उल्लेख किया गया है। प्रथम मौन का सीधा संबंध वाणी से है, जो बहिमौनकहलाता है। अपनी वाणी को वश में करना, न बोलना बहिमौनके अंतर्गत आता है। दूसरा मौन आत्मा से जुडा है, जो अंतमौनकहलाता है। ईष्र्या-द्वेष या अपवित्र विचारों को अपने मन से निकाल कर आत्मोन्मुखीबनना अन्तमौनहै। दूसरों के हित के लिए कहा गया कथन भी मौन के अंतर्गत आता है।
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने मौन की महत्ता जान ली है, वह दुख से कभी विचलित नहीं हो सकता। वह न तो सुख में मगन हो सकता है और न ही दुख से दुखी। वह राग, द्वेष, भय, क्रोध आदि विकारों से दूर रहता है। सच्चे अर्थो में ऐसे व्यक्ति ही साधु कहलाते हैं। यदि आप मौन रहते हैं, तो स्पष्ट है कि आप सहनशील हैं। आप यदि अध्यात्म-पथ की ओर उन्मुख होना चाहते हैं, तो मौन आपके लिए सशक्त माध्यम है। मानसिक तनाव, व्याकुलता और अशांति के क्षण में यह क्षण शांतिदायकहोता है। कहा गया है कि मौन व्रत में ही मुनि जनों की प्रतिष्ठा सुरक्षित रहती है। जो कार्य बोलने से नहीं हो पाता है, वह इससे सहज, सरल बन जाता है। यदि आप कलह और निंदा से बचना चाहते हैं, तो उसका एकमात्र उपाय मौन है।
Saturday, April 16, 2011
अप्रैल 2011 पर्व त्यौहार
15 अप्रैल: बंगाली नववर्ष 1418 शुरू, जूडिशीतल (मिथिलांचल), मदन द्वादशी, विष्णु द्वादशी, श्यामबाबा द्वादशी, अनंगत्रयोदशी (प्रदोषकालीन), प्रदोष व्रत, श्रीहरि-दमनकोत्सव, भीमचंडी-दर्शन, रुक्मिणी जयंती
16 अप्रैल: महावीर जयंती (जैन), शिव दमनक चतुर्दशी, मीनाक्षी कल्याणम् (द.भारत), मदनभंजिका चतुर्दशी (मिथिलां.), रत्नत्रय व्रत 3 दिन (दिग.जैन)
17 अप्रैल: पूर्णिमा व्रत, श्रीसत्यनारायण व्रत-कथा, पाक्षिक प्रतिक्रमण (श्वेत.जैन)
18 अप्रैल: स्नान-दान की चैत्री पूर्णिमा, श्रीहनुमान जयंती, छत्रपति शिवाजी की पुण्यतिथि, वैशाख स्नान-नियम प्रारंभ, षोडशकारण व्रत पूर्ण (दि.जै.)
19 अप्रैल: कच्छपावतार जयंती, वैशाख के प्रत्येक मंगलवार को श्रीमंगलनाथ-दर्शन (उज्जयिनी), आशा द्वितीया
20 अप्रैल: सूर्य सायन वृष में दिन 3.49 बजे, सौर ग्रीष्म ऋतु प्रारंभ
21 अप्रैल: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत, अनुसूइया जयंती
22 अप्रैल: श्रीपंचमी (जम्मू-कश्मीर)
23 अप्रैल: वेताल षष्ठी (जम्मू-कश्मीर), कोकिला षष्ठी (मिथिलांचल), बाबू कुँवर सिंह जयंती (बिहार, झारखण्ड)
24 अप्रैल:भानु सप्तमी, शर्करा सप्तमी (मिथिलांचल)
25 अप्रैल: शीतलाष्टमी-बसौड़ा, कालाष्टमी व्रत, वैधृति महापात रात्रि 9.44 से देर रात 3.20 तक
26 अप्रैल: चण्डिका नवमी व्रत
28 अप्रैल: वरूथिनी एकादशी व्रत, श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु जयंती, श्रीवल्लभ संवत् 534 प्रारंभ, पंचकोशी-पंचेशानि यात्रा शुरू (उज्जयिनी)
29 अप्रैल: एकादशी व्रत (निम्बार्क वैष्णव), वंजुली महाद्वादशी
30 अप्रैल: शनि-प्रदोष व्रत
Friday, April 15, 2011
यश और धन
हिन्दू धर्म शास्त्रों में बृहस्पति को देवगुरु बताया गया है। ज्योतिष शास्त्रों में भी गुरु को शुभ ग्रह माना गया है। गुरु के शुभ प्रभाव से बुद्धि, ज्ञान के द्वारा मान-सम्मान, धन और सुख-शांति प्राप्ति होती है। धर्म, अध्यात्म में रूचि होने के साथ व्यक्तित्व प्रभावशाली बनता है। वहीं अशुभ प्रभाव मानसिक दोष व तनाव के साथ आर्थिक संकट भी पैदा कर सकता है। यही कारण है कि शास्त्रों में गुरुवार को गुरु की उपासना में इन 3 गुरु मंत्रों के विशेष जप बहुत ही असरदार माने गए हैं। जिनके प्रभाव से बुद्धि, यश, सम्मान मिलने के साथ ही आर्थिक परेशानियों का भी अंत होता है। गुरु दोषों का भी शमन होता है। शास्त्रों के मुताबिक इन गुरु मंत्रो की जप संख्या 19000 होनी चाहिए। किंतु अगर इतना कर पाना संभव न भी हो तो यथाशक्ति इन मंत्रों का जप सुबह और शाम किया जा सकता है। किंतु शाम का वक्त श्रेष्ठ माना गया है।
बीज मंत्र - ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:।
सामान्य मंत्र - ॐ बृं बृहस्पतये नम:
पौराणिक मंत्र - देवाना च ऋषिणां च गुरुं कांचसंनिभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।।
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